Saturday, July 11, 2026

मालवा का‌ लोकगीत


सगळा जणा के जे राम जी की । 

             आव आज अपण सगळा लोकगीतां की‌ बात करा। किनी भी लोकभाषा के सीखने, समजने को भोत जोरदार रस्तो हे - लोकगीत। हरेक लोकअंचल में लोकगीतां को चलन रे हे। लोकबोली में ई गीत भोत मजेदार अने जोरदार लगे,‌सुनने‌ में भी मजो आय ने गाने में भी। 

           तो आव आज हूं तमारे सबके मध्यप्रदेश का मालवा छेतर का लोकगीत का बारां में जानकारी दूं।मालवी लोकगीत मालवा की धरती को अमूल्य धन हे। इन लोकगीत माय मालवा की संस्कृति, परम्परा, रीति-रिवाज, खान-पान, खेती-किसानी अने लोकजीवन को सच्चो चितरण देखवा ने मिले हे । लोकगीत सिरफ मनोरंजन को साधन नी,‌ बल्कि  समाज की भावना‌होण, संस्काराहोण अने इतिहास ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पोचाने को रस्तो हे।

             मालवी लोकगीतां को माहत्तम इनी बात माय हे कि ई लोकजीवन ने जीवंत राखे हे । जनम, नामकरण, ब्याव-मांडा, तीज-तेवार, गणगोर, संजा, होली, दिवाली, फसल कटई जसा हरेक मोका पे लोकगीत गाया जाय हे। इन गीतहोण से आपसी पिरेम, भाईचारो अने सामाजिक एकता मजबूत होय हे ।

मालवी लोकगीतहोण की विशेषता‌-

1. ई लोकभाषा माय रच्या-बस्या होय हे, जिका कारण आम मनख आसानी से समजी जाय हे।

2. ईन गीतां माय मालवा की प्राकृतिक सुंदरता, खेत-खलिहान, नद्दी, पहाड़ अने ग्रामीण जीवन को चितरण मले हे ।

3. लोकगीतां माय सरलता, मधुरता अने सहज भावना को समावेश रे हे।

4. ई गीत पीढ़ी दर पीढ़ी बोली परम्परा से चल्या अय रिया हे ।

5. मालवी लोकगीतां माय लोकसंस्कार, नेतिक मूल्य अने सामाजिक संदेश भी समायो रे हे।

6. बन्ना-बन्नी, फाग, संजा गीत, भजन, झूला गीत, लोरी आदि लोकगीत का खासमखास रूप हे।

               एक बानगी देखो-  सबका पेला मांडा- ब्याव में गजानन महाराज जी के न्योतो देनो पड़े-

कई चलो गणेश, अपण जोशी के यां चाला,

कई अच्छा अच्छा लग्ना लिखावो गणेश

म्हारा गणेश दूंदाल्या, 

दूंद दूंदाल्या रे गणपत सूंड सूंडाल्या,

कई झगमग झगल्यो रे गणपत मखदूली टोपी,

कईं बूढ़ा रा बालक हुई ने आवो गणेश,

म्हारा गणेश दूंदाल्या। 

 (इसी प्रकार सभी लोगों का नाम जिनके यहां से वस्तु लेनी है, लेते हुए गीत को आगे बढ़ाना है।‌ )

एक बन्नी गीत की बानगी नज़र करूं -

        दूध भर गिलास हे, 

        रबड़ी लच्छेदार हे,

        पियो-पियो पियारी बन्नी, 

        याज मनवार हे

                 आखरी में कय सका कि मालवी लोकगीत मालवा की आत्मा हे । ई मालवा की पेचान, संस्कृति अने लोकजीवन के जीवितो राखने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाय हे । लोकगीत‌होण को बचानो(संरक्षण) अने बढ़ानो(संवर्धन) आज की सबसे बड़ी जरूरत हे, जिका से आवती पीढ़ी अपणी समृद्ध लोकधरोहर से जुड़ी रय सके।

      ई सब विशेषतां हरेक लोकभाषा का लोकगीत होण में भी मिले हे अने उनको भी उनकी छेतर वास्ते उज माहत्तम हे जो मालवी लोकगीत को मालवा का लिए हे। 


                               हेमलता शर्मा भोली बेन, 

                        लोक साहित्यकार, इंदौर मध्यप्रदेश 


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